History Of Ratangarh Wali Mata Mandir
MADULA DEVI AND KUWAR MAHARAJ
ESTABLISHMENT OF Ratangarh Mata TEMPLE
रतनगढ़ माता मंदिरकी स्थापना

- Ratangarh Mata TEMPLE –
- रतनगढ़ माता मंदिर मां रतनगढ़ सेवा समिति के ट्रस्टी दतिया कलेक्टर हैं और सभी मंदिर गतिविधि ट्रस्ट दतिया कलेक्टर श्री स्वप्निल जी. वानखड़े और सेंवढ़ा के एसडीएम श्री अशोक अवस्थी के अधीन हैं।
- रतनगढ़ माता मंदिर दतिया से 65 किमी दूर तथा रामपुरा गाँव से 11 किमी दूर स्थित है ! यह पवित्र स्थान घने जंगल मे सिंध नदी के तट पर स्थित है ! यहाँ हर वर्ष दिवाली दूज पर हजारों कि संख्या मे लोग दर्शन करने आते है !
- नदी से छ: किलोमीटर दूर स्थित रतनगढ़ माता मंदिर की स्थापना लगभग 700 वर्ष पूर्व सत्रहवीं सदी मे हुई थी। छत्रपति शिवाजी जब बादशाह औरंजगेब की कैद में थे, तब उनके गुरू समर्थ रामदास, रतनगढ माता की मडिया में लगभग 6 माह तक रहे थे। यहीं रहकर उन्होंने शिवाजी को छुड़ाने की योजना बनाई थी। औरंजगेब के कैद से छूटकर शिवाजी सबसे पहले रतनगढ आये थे। उसी समय गुरूसमर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी द्वारा, माता की मूर्ति की स्थापना की गई थी। मां रतनगढ के प्रति अंचल सहित सीमावर्ती जिलों के लाखों लोगो की आस्था जुड़ी है। प्रति सोमवार को मां के दरबार में विशाल मेला लगता है। वही नवरात्रि में लाखों श्रृद्धालु माता के दर्शन करते है।
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- रतनगढ़माता का इतिहास :घने जंगल में सिंध नदी के किनारें विध्यांचल पर्वत श्रृखला के पर्वत पर स्थित देवी मंदिर गवाह हैं कि, यहां पर राजा रतनसेन ने देश धर्म की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक मुगलों से लोहा लिया था। राजा शंकर शाह के पुत्र रतनसेंन ने तेहरवीं शताब्दी 900 वर्ष पूर्व में उसी अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) से लोहा लिया था। जिसकी वजह से पद्मावती को जौहर करना पड़ा था। रानी पद्मिनी को हासिल, कर पाने में असफल अलाउद्दीन की नजर रतनगढ़ की रूपसी राजकुमारी माण्डुला के सौन्दर्य पर पड़ गई थी। उसे हासिल करने के लिए अलाउद्दीन ने रतनगढ़ पर आक्रमण किया था। रतनगढ़ के राजा रतन सिंह के सात राजकुमार और एक पुत्री थी। पुत्री अत्यन्त सुन्दरी थी उसकी सुन्दरता की ख्याति से आकर्षित होकर उलाउद्दीन खिलजी ने उसे पाने के लिए रतनगढ़ की ओर सेना सहित प्रस्थान किया। घमासान युद्ध हुआ जिसमें रतन सिंह और उनके छः पुत्र मारे गये। सातवें पुत्र को बहिन ने तिलक करके तलवार देकर रणभूमि में युद्ध के लिए बिदा किया। राजकुमारी ने भाई की पराजय और मृत्यु का समाचार पाते ही माता वसुन्धरा से अपनी गोद में स्थान देने की प्रार्थना की। जिस प्रकार सीता जी के लिए माँ धरती ने शरण दी थीं, उसी प्रकार इस राजकुमारी के लिए भी उस पहाड़ के पत्थरों में एक विवर दिखाई दिया जिसमें वह राजकुमारी समा गई/ उसी राजकुमारी की यहां माता के रुप में पूजा होती है। यहां यह विवर आज भी देखा जा सकता है। युद्ध का स्मारक हजीरा पास में ही बना हुआ है। हजीरा उस स्थान को कहते हैं जहां हजार से अधिक मुसलमान एक साथ दफनाये गये हों। विन्सेण्ट स्मिथ ने इस देवगढ़ का उल्लेख किया है राजा रतनसेन ने अपनी बेटी की लाज एंव राजपूत गौरव की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। राजा ने बेटी की रक्षा का भार अपने छोटें भाई कुंवर जूं को सौंपकर, अलाउद्दीन खिलजी का सामना किया। जंग में खिलजी के हजारों योद्धा मारे गये जिससे उसे भागना पड़ा था।
- प्रसिद्ध रतनगढ़ माता के मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। यह मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया जिले से 65 किलोमीटर दूर मर्सैनी गांव के पास स्थित है। बीहड़ इलाका होने की वजह से यह मंदिर घने जंगल में पड़ता है। इसके बगल से ही सिंध नदी बहती है! यहां अपनी मन्नतों की पूर्ति के लिए आने वाले लोग दो मंदिर के दर्शन करते हैं। एक मंदिर है रतनगढ़ माता का और दूसरा है कुंवर महाराज का। मान्यताओं के अनुसार कुंवर महाराज रतनगढ़माता के भाई हैं। कहा जाता है कि कुंवर महाराज जब जंगल में शिकार करने जाते थे तब सारे जहरीले जानवर अपना विष बाहर निकाल देते थे। इसीलिए जब किसी इंसान को कोई विषैला जानवर काट लेता है तो उसके घाव पर कुंवर महाराज के नाम का बंध लगाते हैं। बंध लगाने के बाद वो इंसान भाई दूज दीपावली के दूसरे दिन कुंवर महाराज के मंदिर में दर्शन करता है यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुगलों के ऊपर विजय कि निशानी है जो की सत्रहवीं सदी मे युध्द हुआ था छत्रपति शिवाजी और मुगलों के वीच और तब माता रतनगढ़ वाली और कुंवर महाराज ने मदद की थी क्योंकि ।माता रतन गढ़ वाली और कुंवर महाराज ने शिवाजी महाराज के गुरु रामदास जी को पथरी गढ़ यानी देव गढ़ के किले मे दर्शन दिए थे और शिवाजी महाराज को मुगलों से फिर से युध्द के लिए प्रेरित किया था और फिर जब पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासन की सेना जब वीर मराठा शिवाजी की सेना से टकराई तो उन्हें मुंह की खानी पड़ी। मुगल सेना को परास्त करने के बाद शिवाजी ने इस मंदिर को अपनी जीत की यादगार के रूप में बनवाया था।यह मंदिर एक विजयघोष की भी याद दिलाता है। विंध्याचल के पर्वत में होने की वजह से इस मंदिर की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है। विंध्याचल पर्वत को मां दुर्गा का निवास स्थान भी माना जाता है। इस मंदिर में विराजमान माता रतनगढ़ का भक्तों में काफी महत्व हैं।
HISTORY OF RATANGARH MATA
रतनगढ़ माता का इतिहास
रतनगढ़-एक ऐतिहासिक स्थल 1986 में लिखित पुस्तक बाबूलाल गोस्वामी रतनगढ़ माता परमार वंश
बुन्देलखण्ड के उत्तरीवृत्त में विन्ध्य पर्वतमाला के छोर पर ‘रतनगढ़‘ स्थित है । वहाँ एक ऊँची चोटी पर देवी का मन्दिर है। मन्दिर के कुछ फासले पर एक चतुष्कोण चबूतरा है, जिस पर छोटी सी मढ़िया में स्फटिक खिलौना जैसा एक घोड़ा है। एक घोड़ा पहले से कुछ बड़ा बाहर रखा है। उन्हें यहाँ की बोली में “घुल्ला” कहते हैं। देवी का नाम माडूला है, परन्तु अब “रतनगढ़ की माता के नाम” से प्रसिद्ध है । चबूतरा को “कुंवर” का स्थान कहते हैं। लोकमान्यताएँ तो अचरज भरी हैं; लेकिन वहाँ प्रत्यक्ष देखने के अनन्तर तर्क और अन्धविश्वास के प्रति उपेक्षा दोनों का अवसान हो जाता है। शेष रहता है चम– स्कार, जो साफ दिखाई देता है। दीपावली की दोज के दिन यहाँ लक्खी मेला लगता है । हमें लक्खी क्या दोलक्खी मेला देखने का अवसर मिला। इस मेले का भाई दोज के दिन आयोजन एवं देवी और कुंवर के सन्दर्भ ऐतिहासिक हैं; किन्तु समय बीतते–बीतते देवी रूप में बदल चुके हैं। इतिहास के पृष्ठ नष्ट हो गये, स्मृतियाँ विलीन हो गईं।
14 नवम्बर 85 को हम पत्रकारों के झुण्ड में शामिल होकर जिला पुलिस अधीक्षक श्री गिरीश कुमार तिवारी के साथ रतनगढ़ की यात्रा करने गये। उस दिन दीपावली की दोज थी । हमारा काफिला पाँच जीपों का था । श्री गिरीशजी की गाड़ी सबसे आगे और पीछे की जीप में टी. आई. सुभाष तिवारी चल रहे थे। आगे और पीछे की गाड़ियों में वायरलेस फिट थे तथा एक–एक ब्रेनगन वाला होशियार जवान चौकस चल रहा था। श्री गिरीश का उद्देश्य पत्रकारों को वह महत्वपूर्ण और मार्के का स्थान निरीक्षण कराने का था जहाँ उन्होंने कुछ दिन पूर्व डाकुओं को धराशायी करने में कामयावी हासिल की थी। हमारा लक्ष्य उस विलक्षण प्राकृतिक भूमि के दर्शन करने का था, जहाँ के शूरमाओं ने महमूह गज– नवी को भारतीय रणकौशल से परिचित कराया था, अलाउद्दीन खिलजी को मार्ग बदलकर दक्षिण की ओर जाने को विवश किया था और जहाँ बैठकर समर्थ गुरु रामदाम ने छत्रपति शिवाजी को औरंगजेब के चंगुल से बाहर होने की योजना बनाई थी ।
Ratangarh Mata Mandir (रतनगढ़ धाम दतिया) Maa Mandula Devi & Kuwar Maharaj
मार्ग में कई तीन ओर से रतनगढ़ का उत्तुंग दुर्ग चोटियाँ लाँघ कर हम वहाँ पहुँचे । एक चौड़े पाट के साथ गढ़ की ढाल बनकर बहती है । वहाँ दतिया से मगुआपुरा बेरछा होकर, दूसरा भरसेनी से, भरसेनी और बेरछा सिन्ध के तटवर्ती गांव हैं। यहाँ देवी के मन्दिर में पहले देवी की मूर्ति नहीं थी।
17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास जी ने रतनगढ़ माता मंदिर देवी जी (मां मांडूला) की मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी
17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास जी ने वहाँ देवी जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। औरंगजेब की गिरफ्त से शिवाजी को मुक्त कराने की योजना के कार्यान्वयन तक के लिए गुरु रामदास जी वहाँ रहे थे। शिवाजी भी आगरा से मुक्त होकर सर्वप्रथम रतनगढ़ आये थे। इससे पूर्व वहाँ केवल मढ़ी थी, जिसका कथानक बहुत रोचक है ।
कहते हैं तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में अलाउद्दीन खिलजी ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया उस समय रतनगढ़ में राजा रतन सेन
इटावा होकर जब परमार थे। राजा रतनसेन के एक अवयस्क राजकुमार और एक राजकुमारी थी। कहा जाता है कि राज– कुमारी का नाम “माडूला” था । अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उसे पद्मिनी भी कहते हैं । खिलजी ने इसी पद्मिनी को प्राप्त करने के उद्देश्य से रतनगढ़ पर आक्रमण किया था । भयंकर युद्ध हुआ । रतनसेन मारे गये। राजकुल और क्षत्राणियों के साथ रतनगढ़ की हिन्दू महिलाओं ने रतनगढ़ के दुर्ग में जौहर व्रत में प्राणोत्सर्ग किये। राजा रतनसेन का जिस स्थान पर दाह–संस्कार हुआ उसे आज चिताई कहते हैं। राजा के साथ अनेक योद्धाओं का भी दाह–संस्कार किया गया था। इस युद्ध में रतनगढ़ के सूरमाओं ने लड़ते–लड़ते वीरगति प्राप्त की थी। जब एक भी न बचा तब राज कन्या तथा अबोध राजकुमार ने भी घास के ढ़ेर में आग लगाकर प्राण त्याग दिये थे। जहां राजकुमारी ने प्राणोत्सर्ग किया था उसी जगह एक छोटी सी मड़िया बना दी गई थी। मड़िया के पीछे पहाड़ की समानान्तर चोटी के छोर पर बना चबूतरा राजकुमार द्वारा प्राण त्यागने का स्थान है, जिसे ‘कुंवर का चौतरा‘ कहते हैं। कालान्तर में राजकन्या और राजकुंअर देवकोटि में माने जाने लगे और उनकी पूजा होने लगी । इन भाई बहिन की स्मृति में दीपावली की भाईदाज का लक्खी मेला लगता है। मड़िया में पहले देवी की मूर्ति नहीं थी तथा ‘माला‘ की मडिया के नाम से प्रसिद्ध थी । समर्थ गुरु रामदास ने उस मड़िया में देवी की मूर्ति स्थापित की। तब से रतनगढ़ की माता के नाम से मन्दिर प्रख्यात हुआ। डाकुओं का वह महत्वपूर्ण आश्रय है । मान्यता है कि प्रायः सभी डाकू डाका डालने के पहले वहाँ नारियल फोड़ते है । चम्बल– सिन्ध घाटी का कोई डाकू ऐसा नहीं हुआ जिसने वहाँ घण्टा न चढ़ाया हो । बहुत से घण्टे वहाँ अभी लटकते हैं, जिनपर डाकुओं के नाम अंकित हैं। कुछ को पुलिस अधिकारियों ने उतरवा कर जमा किया है। डाकू गिरोह रतनगढ़ के जंगलों के रक्षक भी हैं अन्यथा अभी तक पूरा जंगल साफ हो जाता ।
History of Ratangarh Mata Mandir with Parmar Vansh-
स्व. श्याम सुन्दर 'श्याम' स्मृति ग्रन्थ-1 / 27 1986 में लिखित पुस्तक
History of Ratangarh Mata Mandir- बुन्देलखण्ड में पवाया, करैरा, केरुवा और बेरछा परमार राजाओं के ठिकाने प्रसिद्ध हैं। इन्हीं की एक शाखा करहिया में स्थापित हुई थी । प्रदेश के गृह राज्यमन्त्री कैप्टन जयपाल सिंह करहिया वंश के परमार ठाकुर हैं। वस्तुतः परमार क्षत्रियों का बुन्देल खण्ड में आगमन बारहवीं शताब्दी से पूर्व राजस्थान और मालवा दोनों ओर से हुआ था । वे आबू पर्वत को ही अपना मूल स्थान मानते हैं, जहाँ उनके रजवाड़े थे । आबू पर्वत का सम्पूर्ण क्षेत्र परमारों के अधिकार में था, बल्कि उसके सुदूर क्षेत्रों में परमारों का प्रभुत्व हो गया था । विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी में नाडोल के चौहानों से परमारों का संघर्ष हुआ । उसी साथ अनहिलवाड़ा के चालुक्यों ने परमारों के ठिकानों पर आघात किया था । उस दुतरफी मार से परमारों के पैर उखड़ गये तथा वे यत्र-तत्र पलायन करने को विवश हुए। चौहान राजा लुम्बा ने परमारों को माउन्ट आबू त्यागने को पुनः विवश किया।
बुन्देलखण्ड के इतिहास में पवांया के परमार राजा पुण्यपाल ( 1231-56 ई.) का नाम मिलता है,
जिसे सोहनपाल बुन्देला की लड़की धर्मं कुंवरि ब्याही थी । पुण्यपाल ग्वालियर के तोमर राजा का भानेज था । इससे विदित होता है कि परमार ग्यारहवी वीं शताब्दी के अन्त में ही पवया तक आ पहुँचे थे। पुण्यपाल पंवार के चार पुत्र थे- रतनशाह जैतसिंह या जैतशाह, शंकरशाह और चन्द्रहंस ।
रतनशाह को करेरा की जागीर मिली। इनके वंशधर करेरा वाले कहलाये । जैतशाह को केरुवा, शंकर- शाह को बेरछा की जागीर मिली। इनके वंशधर बेरछा वाले कहलाये। चौथे को घाटी मया- पुर की बैठक मिली थी (बुन्देली वीर वार्ता पृष्ठ 88 ) । अस्तु बेरछा में सर्वप्रथम शंकरशाह ने स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ अलग छोटा सा राज्य स्थापित किया था । शंकरशाह के पुत्र थे रतनसेन । इन्हीं रतनसेन ने सिन्ध नदी के उस पार रतनगढ़ दुर्ग का निर्माण कराया था । रतनसेन के बड़े भाई कनकसेन बेरछा में ही रहे । कनकसेन के पुत्र चन्द्रसेन की बेटी गढ़कुढ़ार के बुन्देला राजा मलखान 1468-1501 ई. को ब्याही थी । मलखानसिंह ने उनके सहयोग से पवांया को हस्तगत कर सिंध नदी जलप्रपात पर एक बारादरी का निर्माण कराया था। चन्द्रसेन के दो पुत्र हुए चितामणि और उदयमणि । उदयमणि की प्रारम्भ से ही भक्ति में पूर्ण निष्ठा थी । अतः वे वृन्दावन चले गए थे और हितहरिवंश जी के ज्येष्ठ पुत्र वनचन्द्र ‘चन्द्र’ जी के शिष्य होकर वहीं नेही नागरीदास के नाम से रहने लगे थे। इनकी भावज भागमती उच्चकोटि की भक्त थीं और नागरीदास के साथ बरसाने में रहने लगी थी। भग- वतमुदितजी ने अपने ग्रन्थ “रसिक अनन्यमाल” (वि. सं. 1705 ) में इनका और इनकी भावज का परिचय लिखा है कि राजा चिंतामणि अपनी रानी भागमती से असन्तुष्ट थे और वास देते थे । अतः भागमती अपने मायके ओरछा चली आई थीं, वहाँ से वे बरसाना गई थीं। बृज साहित्य में नागरीदास का जन्म संवत 1590 के लगभग माना जाता है, जो सही नहीं है । यह वह समय है कि जब वीरसिंह जू देव प्रथम ने ओरछा पर आक्रमण किया था। केशवदास मिश्र ने इस घटना का उल्लेख वीरचरित्र में किया है। दोई गढी लीने लैवरा एक वैरछा एक कहरा” । दतिया-बड़ोनी की जागीर प्राप्त होने के बाद बीरसिंहजू
देवका प्रथम सैनिक अभियान था सम्भब्ता वीरसिंह जू देव
‘के देहावसान (1592 ई.) के तुरन्त पश्चात यह अभियान किया होगा । बेरछा के राजा चितामणि इसी युद्ध में मारे गये होंगे और उनके भाई नागरीदास तब बृन्दावन चले गये होंगे ।
परमार और बुन्देला राजाओं के इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए रतनगढ़ का मध्य क्षेत्र एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है ।
रतनगढ़ माता मंदिर: में बनी थी शिवाजी को आजाद कराने की रणनीति
- स्वाभिमान की रक्षा करने वाले व् मराठा साम्राज्य की पताका फहराने वाले महान राजा छत्रपति शिवाजी को एक बार औरंगजेब ने पुत्र समेत धोखे से बुलाकर बंदी बना लिया था। शिवाजी महाराज को आजाद कराने उनके गुरू समर्थ स्वामी रामदास और दादा कोण देव महाराष्ट्र से ग्वालियर के पास दतिया के रतनगढ़ माता मंदिर में आकर रहे
रतनगढ़ माता मंदिर में की थी गुरु रामदास ने साधना-
- रतनगढ़ माता मंदिर में ही समर्थ रामदास और दादा कोण देव ने आध्यात्मिक साधना के साथ स्वामी रामदास ने छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके पुत्र को आजाद कराने के लिए कूटनीतिक तैयारियां भी इसी मंदिर में रहकर की थीं।समर्थ गुरु स्वामी रामदास ने इस मंदिर में 6 महीने तक कठोर साधना की और शिवाजी महाराज को आगरा किले से छुड़ाने की रणनीति बनाई। औरंगजेब को भेंट के तौर पर फलों की टोकरियां भिजवाई जाती थीं. रामदास ने इस चीज का फायदा उठाकर पहले तो अपने एक शिष्य को औरंगजेब का विश्वास जीतने के लिए कहा और जब ऐसा करने में वो सफल हुआ तो भेंट स्वरूप औरंगजेब के यहां फलों से भरी टोकरियां भिजवाई गईं जो ऊपर से ढकी हुई थी। जिसके तहत स्वामी रामदास के शिष्यों ने जेल में शिवाजी महाराज को भेंट करने फलों की टोकरियां भेजनी शुरू कर दीं।कई दिनों की गहन जांच के बाद जब जेल के पहरेदारों को भरोसा हो गया तो एक बार बेहद बड़ी टोकरियों में फलों में छिपाकर कुछ हथियार भी शिवाजी और उनके पुत्र के लिए भेजे गए थे। अपने गुप्तचर से रामदास ने शिवाजी को योजना के बारे में पहले ही सूचना भिजवा दी थीशिवाजी महाराज ने भी पहले दिन से ही फलों की टोकरियों से कुछ फल लेकर बाकी फलों से भरी टोकरियां बाहर गरीबों में दान के लिए भेजना शुरू कर दी थीं।उस दिन जब शिवाजी महाराज को उन टोकरियों में हथियार मिले तो वह संकेत समझ गए और उन बड़ी टोकरियों में अपने साथ अपने पुत्र को बिठा कर गरीबों में फल बांटने के बहाने स्वामी रामदास के शिष्यों को भिजवा दीं। स्वामी रामदास के शिष्य उन टोकरियों के वजन से सारा मामला समझ गए और शिवाजी महाराज को उनके पुत्र के साथ आगरा से पार करग्वालियर भेज दिया गया। उसके बाद शिवाजी महाराज अपने पुत्र के साथ समर्थ गुरु स्वामी रामदास के पास दतिया पहुंच गए।
रतनगढ़ माता मंदिर का करवाया शिवाजी ने जीर्णोद्धार-
- छत्रपति शिवाजी महाराज ने रतनगढ़ माता मंदिर पहुचकर अनुष्ठान कर माता को घंटा चढ़ाया एवं उसके बाद मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया।शिवाजी महाराज के घंटा चढाने के बाद से मंदिर में घंटा चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत हो गई, और श्रद्धालु़ मनोकामना पूर्ति के लिए यहां पीतल का घंटा चढ़ाने लगे। नवरात्रि के दिनों में श्रदालुओं द्वारा मंदिर में कई टन में घण्टे चढ़ जाते हैं। विंध्याचंल पर्वत श्रृखंलाओं के पर्वत पर, सिंध नदी के किनारे जंगल में विराजमान मां रतनगढ़ का दरबार, श्रृद्धालुओं की आस्था से कई वर्षों से रोशन हैं। इस मंदिर को सिद्ध माना जाता है इसलिए यहां मन्नतों के पूरी होने की भी चर्चाएं काफी मशहूर हैं। यहां पर भक्त अपनी-अपनी तरह से मां को श्रद्धा प्रकट करते हैं। कोई नंगे पांव तो कोई जमीन पर लेट- लेटकर यहां आता है। और कोई जवारे वो कर माता रानी की नौ दिन तक सेवा करते हैं और नवे दिन जवारे चढ़ाने पैदल कई कोषों दूर से आतें हैं और हर भक्त अपनी मुरादें पूर्ण कर अपने घर खुशियां लेकर वापस लौटता है.. ऐसा माँ के हर भक्त का कहना है कि मईया अपने भक्तों को कभी निराश नही करती, मईया भक्तों की हर समस्या को दूर कर उनकी मनोकामना अवश्य पूरी करती
रतनगढ़ माता मंदिर पर चढ़ा हैं देश का सबसे बढ़ा घंटा:
- रतनगढ़ माता मंदिर पर चढ़ा हैं देश का सबसे बढ़ा घंटा:मन्नत पूरी होने पर श्रृद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष सैंकड़ो घंटे मां के दरबार में चढायें जाते है। मंदिर पर एकत्रित हुए घंटों की पूर्व में नीलामी की जाती थी। वर्ष 2015 में जिला प्रशासन की मंशा पर यहां पर एकत्रित घंटों को गलवाकर विशाल घंटा बनवाकर चढ़ाया गया है। लगभग 10 क्विंटल वजन के इस घंटे की नीचे की गोलाई का व्यास5 इंच है। घंटा टांगने के हुक के व्यास की गोलाई 1.8 इंच है। घंटे की एक ओर त्रिशूल दूसरी ओर बैल के सींग दर्शायें गये हैं। घंटे पर 18 ॐ एंव 18 स्वास्तिक चिन्हित किये गये है। पूरे घंटे के ऊपर से नीचे तक 9 रिंग बनाये गये है।रतनगढ़ माता मंदिर पर नवरात्र 16 अक्टूबर2015 में देश का सबसे वजनी बजने वाला पीतल के घंटे का उदघाटन मान्यनिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और साथ मे आये नरोत्तम मिश्रा जी द्वारा किया गया । जिसको नौ धातुओं से मिलाकर बनाया गया हैऔर इस घंटे की खासियत यह है कि इसको कोई भी बजा सकता है चाहे चार साल का बालक या बालिका या फिर अस्सी साल का कोई बुजुर्ग इसका लगभग वजन दो टन है और इसको लटकाने वाले पिलर लगभग तीन टन के हैदरअसल मंदिर पर श्रद्घालुओं द्वारा चढ़ाने जाने वाले घंटों की मंदिर प्रबंधन कमेटी नीलामी कराती थी। कलेक्टर प्रकाश जांगरे ने घंटों की नीलामी न कराकर छोटे घंटों को मिलाकर बड़ा घंटा बनवाने का निर्णय लिया तथा यह कार्य ग्वालियर के मूर्तिकार प्रभात राय को सौंपा।पहले घंटा1100 किलो का बनवाया जा रहा था पर अब इसका वजन 1935 किलो है नवरात्र पर्व पर रतनगढ़ माता मंदिर पर श्रद्घालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है ।
- दतिया जिला मुख्यालय से 65 किमी दूर रतनगढ़ माता का मंदिर (Ratangarh Mata Temple) है। आदिकाल से मन्नत पूरी होने पर मां के दरबार में घंटा चढ़ाये जाने की परंपरा है। प्रतिवर्ष हजारों घंटे मां के दरबार में चढ़ाये जाते है। इसी श्रृद्धाभाव के तहत डकैतों ने भी यहां पर बडें-बडें घंटे चढ़ाये हैं। नवरात्रि एंव दीपावली की दूज पर यहां विशाल मेला लगता है। नवरात्रि के दिनों में यहां पर लाखों श्रृद्धालु माता के दर्शन के लिए आते है।
Ratangarh Mata temple disclaimer
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